प्याज

1. खेत की तैयारी :-

प्याज बुवाई कार्य के लिये पूरा जून महीना उपयुक्त होता है।

2. किस्म का चयनः

खरीफ में प्याज उत्पादन के किये उपयुक्त प्रजातियों में एग्री फाऊण्ड डार्करेड (फसल अवधि 140-145 दिन, उपज क्षमता 200-275 क्वि. प्रति हैक्ट), वसन्त 780 : (फसल अवधि रोपाई के 100-110 दिन, उपज क्षमता 250 क्वि. प्रति हैक्ट . )

3. बीज की मात्रा:

बीज की 7-8 किलो मात्रा प्रति हैक्ट. पर्याप्त होती है।

4. बीजोपचार :

खरीफ प्याज उत्पादन के लिये बीज की बुवाई उपचार कक्कनाशी दवा (थायराम या केप्टान 2–3 ग्रा. दवा प्रति किलो बीज दर से) से करे।

5. बुवाई की पद्धति

पौध तैयार करना :

बीज को उपचारित करने के पश्चात जमीन से उँची (एक फीट) उठी हुई क्यारियों ( 3 मीटर x 0.60 मीटर) में पंक्तियों में बुवाई करें। यदि रोग लगने की संभावना हो तो पौधा शाला की मिट्टी को 4-5 ग्रा. दवा (थायराम/केप्टान) प्रति वर्गमीटर की दर से उपचारित करें या ट्राइकोडर्मा विरिडी से उपचारित करें। खरीफ में 6–7 सप्ताह में पौध रोपाई के लिये तैयार हो जाती है ।

पौध की रोपाई :

खरीफ में रोपाई अगस्त के प्रथम पक्ष में करते है रोपाई पूर्व 200 किलो केल्शियम अमोनियम नाइट्रेट या 100 किलो यूरिया, 300 किलो सिंगलसुपर फास्फेट तथा 100 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह मिलाये। साथ ही 20 टन केंचुआ खाद प्रति हैक्ट. की दर से प्रयोग करे ।

रापोई पूर्व पौध की जड़ो को 0.1 % कार्बेडांजिम + 0.1 % मोनोक्रोटोफॉस दवा के घोल में डुबोकर उपचारित करे। फिर पौधो को कतारो में 15 से.मी. की दूरी तथा पौधो से पौधो की दूरी 10 से.मी. रखते हुये रोपाई करें।

रोपाई उपरांत फसल की देखभाल :

प्याज की फसल अधिक गहरी जड़ो वाली नही होती है, अतः निंदाई गुड़ाई के समय ये एक बात ध्यान रखनी चाहिये। अच्छी फसल के लिये प्रारंभिक 30-45 दिनो तक 2-3 निदाई-गुड़ाई कर खेत को खरपतवार से मुक्त रखना जरुरी है। खरतपवारो के रासायनिक नियंत्रण के लिये स्टाम्प 3.5 ली/प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें ।

सिंचाई के लिये ड्रिप / टपक सिंचाई पद्धति का प्रयोग सर्वोत्तम है । सामान्य विधि से सिंचाई करते समय ठंड में 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।

6. खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण के लिये रासायनिक उपाय के अंतर्गत रोपाई पूर्व आक्सीफलोरफेन 100 ग्रा. प्रति एकड़ या आक्साडापरजिल (40 ग्रा. प्रति एकड़) का रोपाई पूर्व प्रयोग करे ।

रोपाई के चार सप्ताह बाद 200 किलो किसान खाद या 100 किलो यूरिया प्रति हैक्ट. की दर से छिटकाव विधि से मिला देते है यूरिया के प्रयोग के समय इस बात का विशेष ध्यान रखे कि खेत में पर्याप्त नमी हो। हलकी जमीन में यूरिया को 2 बराबर भागो में बॉट दें। रोपाई के 15 और 45 दिन पश्चात 0.5% बायोअल्जीन एस90 या 0.2% साइटोजायम का प्रयोग भी किया जा सकता है। रोपाई के 15, 30 एवं 45 दिन पश्चात पालीफीड ( 19:19:19 NPK TE) का 1% तथा 60975 एवं 90 दिन पश्चात मल्टी में ( 13:0:45 ) का 1% का छिड़काव करने से पैदावार तथा कंद की गुणवत्ता अच्छी आती है।

7. सिंचाई :

8. कीट – व्याधि रोग प्रबंधन एवं उपचार

प्याज की फसल में थ्रिप्स नामक कीट का प्रकोप होने पर मोनोक्रोटोफास 1-1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से या सायपर मेथ्रिन 10 ई.सी. का ( 1 – 1.5 मि.ली प्रति लीटर पानी की दर से) छिड़काव करें। छिड़काव वाले घोल में दवा चिपकाने के लिये सेंडोविट 0.06 प्रतिशत की दर से अवश्य मिलाये साथ में नीम तेल या छिड़काव भी प्रभावकारी होता है। नर्सरी अवस्था में यदि पौधो के गलने की समस्या आती है तो 0.2 प्रतिशत थायराम के घोल से ड्रेचिंग (या टोहा) करें।

प्याज में थ्रिप्स के नियंत्रण के लिये फिप्रोनिल दवा या एसिटामिप्रिड 6-8 ग्रा. प्रति पंप ( 15 ली.) की दर से छिड़काव करें।

पर्पल ब्लॉच (बैंगनी धब्बा) या स्टेमफिलियम झुलसा आते है इनके नियंत्रण के लिये मेंकोजेब 2.50 ग्रा. अथवा क्लोरोथेलोनील 2.00 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर 10-15 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें।

प्याज की अच्छी गुणवत्ता के लिये खुदाई के 10 दिन पूर्व छिड़काव बंद कर दें तथा भण्डारण में अंकुरण रोकने के लिये रोपाई के 75 दिन पश्चात 0.20 -0.25 प्रतिशत मैलिक हाइड्राजाइड रसायन का छिड़काव करे तथा खुदाई के 15 दिन पूर्व सिंचाई पूर्ण तथा बंद कर देवे । भण्डारण में बीमारियों का प्रकोप कम करने के लिये खुदाई के 15-20 दिन पूर्व 0.1 प्रतिशत कर्विन्डाजिम का छिड़काव करने से भण्डारण में हानि कम होती है तथा खुदाई पश्चात पत्तियों के कटाई उपरांत छाया में सुखाकर टापसिन एम 0.1 प्रतिशत + स्ट्रेप्टोसायक्लीन 0.02 प्रतिशत का छिड़काव करने से भी भण्डारण के दौरान बीमारियों का नियंत्रण हो जाता है।

प्याज खुदाई, तथा खुदाई उपरांत प्रबंधन :

खरीफ की फसल तैयार होने में लगभग 5 माह का समय लगता है एवं फसल नवम्बर माह में तैयार होती है। इस समय तापमान काफी कम होने के कारण पौधो की पत्तियाँ पूर्ण रुप से सुख जाये तो गांठो को निकाल कर देखले कि उनका आकार पूर्ण तथा विकसित हो गया हो तथा रंगलाल होने के साथ वे ठोस हो गई हो। परंतु यदि पूर्ण विकास के पश्चात भी यदि गांठो की खुदाई नही की जाती है तो उनमें फटन शुरु हो जाती है। खुदाई के पश्चात पत्तियों को ऊपर से पूर्णयता हटा दे तथा छाया में एक सप्ताह तक सुखा लें। तथा इसी दौरान खुदाई के दौरान कटी-फटी, रोग ग्रस्त गांठो दो भागो में बंटी हुयी गांठो को छांट कर अलग कर दें तथा अच्छी तरह सुखने के पश्चात हवादार स्थान पर भण्डारण करें ।

Write a comment

Your email address will not be published. All fields are required